ब्लैक होल कोई अंधकार नहीं,
यह तो ब्रह्मांड का
अपने भीतर लौटता हुआ प्रश्न है।
जहाँ प्रकाश भी
अपनी आख़िरी साँस लेकर
मौन में विलीन हो जाता है,
वहाँ शोर की कोई स्मृति नहीं रहती—
केवल ध्यान बचता है।
ब्लैक होल
न निगलता है, न नष्ट करता है,
वह बस सबको
उनके मूल तक पहुँचा देता है।
यह गुरुत्व का क्रोध नहीं,
अस्तित्व की करुणा है—
जो कहती है,
“बहुत भटक लिया,
अब भीतर आओ।”
तारे वहाँ गिरते नहीं,
वे समर्पण करते हैं
समय वहाँ टूटता नहीं,
वह थक कर
आँखें बंद कर लेता है।
ब्लैक होल
ब्रह्मांड का वह क्षण है
जहाँ गति रुक जाती है,
और अर्थ शुरू होता है।
यह समाधि है—
जहाँ न ‘मैं’ बचता है,
न ‘तू’,
न दूरी,
न दिशा।
सिर्फ़
एक सघन शून्य
जो सब कुछ समेटे हुए
कुछ भी नहीं कहता।
और शायद
इसीलिए
ब्लैक होल
ब्रह्मांड का सबसे गहरा
उपदेश है—
कि अंतिम सत्य
शब्दों में नहीं,
ऊर्जा में नहीं,
प्रकाश में भी नहीं,
बल्कि
पूर्ण मौन में प्रकट होता है।