अखंड श्वास

अखंड श्वास
पृथ्वी की साँस—
मिट्टी में धँसी,
बीजों के भीतर
चुपचाप चलती हुई।


ब्रह्मांड की साँस—
आकाश के फेफड़ों में
तारों की धड़कन बनकर
फैलती–सिकुड़ती।


जीवन की साँस—
एक क्षण में
देह के भीतर
जागती हुई प्रार्थना।


तीनों
अलग-अलग नहीं—
एक ही
अखंड लय में
बहती हैं।


जहाँ पृथ्वी साँस लेती है
वहीं आकाश
थोड़ा और
खुल जाता है,
वहीं जीवन
अपनी आँखें
खोलता है।


पर जैसे ही
कहीं एक साँस
रोक दी जाती है—
जंगल कटते हैं,
नदियाँ रुकती हैं,
हवा काँपने लगती है।


विच्छिन्न होते ही
संतुलन
दरारों में बदल जाता है,
लय टूटते ही
संगीत नहीं—
सिर्फ़ शोर बचता है।


तब पृथ्वी
थककर साँस छोड़ती है,
ब्रह्मांड
अपनी गति
भूलने लगता है,
और जीवन
डर के साथ
जीना सीखता है।


इसलिए सुनो—
साँस बचाना
कोई आध्यात्मिक बात नहीं,
यह
अस्तित्व की
मूल क्रिया है।


पृथ्वी की साँस,
ब्रह्मांड की साँस,
जीवन की साँस—
तीनों को
एक साथ
चलने दो।


क्योंकि
साँस की लय ही
जीवन का
अखंड सूत्र है।

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