कविता से अक्सर पूछा जाता है—वह क्या कहती है? या कविता क्या है? लेकिन उससे ज़्यादा ज़रूरी प्रश्न है—कविता क्या करती है?
कविता अर्थ नहीं बनाती — अर्थ की जल्दी को रोकती है, कविता का पहला काम मतलब पैदा करना नहीं है, बल्कि उस जल्दबाज़ी को रोकना है जिसमें हम हर चीज़ का तुरंत अर्थ निकाल लेना चाहते हैं।
कविता कहती है—“ठहरो, अभी समझना ज़रूरी नहीं।” यह ठहराव आज के समय में एक क्रांतिकारी कर्म है।
कविता भाषा को काम से मुक्त करती है- सामान्य भाषा का उपयोग होता है—समझाने के लिए, मनाने के लिए, बेचने के लिए, आदेश देने के लिए। कविता भाषा को पहली बार बेकार होने का अधिकार देती है और जब भाषा बेकार होती है, तभी वह सबसे ज़्यादा मनुष्य बनती है।
कविता सोचने से पहले की अवस्था को बचाती है- हम सोच को बहुत महत्व देते हैं,
लेकिन सोच से पहले भी एक ज़िंदगी होती है— जहाँ अनुभव है, जहाँ संवेदना है, जहाँ नाम नहीं हैं। कविता उस पूर्व-चिंतन अवस्था की स्मृति है
जिसे हमने स्कूल, समाज और सफलता की दौड़ में खो दिया।
कविता समय को नरम कर देती है- घड़ी का समय कठोर होता है—वह चलता है, रुकता नहीं। कविता पढ़ते समय समय फैल जाता है, कभी सिकुड़ जाता है, कभी गिर पड़ता है।
एक मौन विद्रोह है।
कविता भीतर के शोर को नहीं, भीतर की खामोशी को आवाज़ देती है यह बात उलटी लग सकती है, लेकिन सच यही है— कविता शोर में नहीं, खामोशी में जन्म लेती है। वह उस मौन को बोलती है, जो बोल नहीं सकता था।
कविता व्यक्ति को बेहतर नहीं बनाती — अधिक ईमानदार बनाती है कविता कोई नैतिक प्रशिक्षण नहीं है। वह आपको अच्छा इंसान बनाने नहीं आती, वह आपको आपके असलीपन के सामने खड़ा कर देती है— और यह काम अक्सर असहज होता है।
कविता दुनिया नहीं बदलती —दुनिया बदलने की ज़रूरत को असहनीय बना देती है कविता क्रांति नहीं करती, लेकिन वह ऐसी बेचैनी पैदा करती है कि पुरानी दुनिया में रहना कठिन हो जाता है। यह बेचैनी ही परिवर्तन की जमीन है।
कविता उत्तर नहीं देती —प्रश्न को जीवित रखती है जहाँ दर्शन प्रश्नों के उत्तर खोजता है, कविता प्रश्न को मरने नहीं देती। वह प्रश्न को साँस लेने देती है, उसके साथ जीना सिखाती है।
कविता पाठक से कुछ नहीं माँगती — सिर्फ़ उपस्थित रहने को कहती है कविता को समझना ज़रूरी नहीं, उससे सहमत होना भी ज़रूरी नहीं।
बस उसके साथ कुछ देर हो जाना पर्याप्त है।
कविता मनुष्य की आख़िरी मानवीय शरण है
जब सब कुछ मापा जाने लगे—भावनाएँ भी, रिश्ते भी, विचार भी—तब कविता वह जगह है
जहाँ मनुष्य अब भी अनमाप्य रह सकता है।
“कविता समय के तानाशाहीपन के खिलाफ एक मौन विद्रोह है”
कविता दरअसल समय की उस परिभाषा को चुनौती देती है, जिसे हमने घड़ी, कैलेंडर और उपयोगिता के हवाले कर दिया है।
समय का तानाशाहीपन क्या है? तानाशाही समय वह है— जो कहता है: “आगे बढ़ो” जो पीछे देखने को अपराध बनाता है, जो ठहराव को आलस्य कहता है, जो वर्तमान को केवल भविष्य की सीढ़ी मानता है यह समय रेखीय है—शुरू → बीच → अंत, जन्म → काम → मृत्यु और इसी रेखा में मनुष्य उपयोगी या अनुपयोगी घोषित होता है।
कविता इस समय के साथ क्या करती है? कविता समय को तोड़ती नहीं—वह उसे मोड़ देती है। कविता में—स्मृति भविष्य से बात करती है, मृत व्यक्ति अचानक उपस्थित हो जाता है, एक क्षण पूरा जीवन हो जाता है, सदियाँ एक पंक्ति में समा जाती हैं, यह कालक्रमानुसार का अंत है, और अनुभव-समय की वापसी।
मौन विद्रोह क्यों? कविता न नारा लगाती है, न समय से लड़ने की घोषणा करती है। वह बस—धीमी हो जाती है, रुक जाती है, देखती है
साँस लेती है, और यही तानाशाही के लिए असहनीय होता है।
कुछ कविताएँ जहाँ समय हार जाता है
(क) Four Quartets – टी. एस. एलियट- “Time present and time past
Are both perhaps present in time future…” यहाँ समय सीधा नहीं चलता—
वह घूमता है, गूंजता है, एक-दूसरे में घुलता है।
एलियट कविता में समय को, इतिहास नहीं, स्थिति बना देते हैं।
यह कविता समय की रेखा नहीं, समय का मंडल रचती है।
(ख) Songs of Innocence and of Experience – विलियम ब्लेक। ब्लेक का समय बचपन से बुढ़ापे तक नहीं जाता—
वह एक साथ मौजूद रहता है। Innocence कोई बीता हुआ चरण नहीं Experience कोई अंतिम सच नहीं। कविता कहती है—मनुष्य एक साथ शिशु भी है और वृद्ध भी। यह समय की जैविक धारणा के खिलाफ विद्रोह है।
(ग) एमिली डिकिन्सन “Forever — is composed of Nows —” यह पंक्ति समय के तानाशाह पर सबसे शांत हमला है। यह कहती है—कोई भविष्य नहीं कोई अतीत नहीं, बस यह क्षण, और यही अनंत है।
कविता समय को छोटा नहीं करती, क्षण को अनंत बना देती है।
(घ) कबीर – कबीर का समय—न इतिहास है
न भविष्य, न मोक्ष की प्रतीक्षा “काल करे सो आज कर आज करे सो अब” यह समय-प्रबंधन नहीं, समय का विसर्जन है।
कविता यहाँ समय को ही अनावश्यक बना देती है।
गजानन माधव मुक्तिबोध- मुक्तिबोध की कविताओं में समय टूटता है, बिखरता है, डराता है। उनकी कविता में— सपना वर्तमान में घुस आता है, भविष्य डर की तरह उपस्थित होता है
अतीत पीछा करता है यह समय की न्यूरोटिक अवस्था है—और कविता उसे उजागर कर देती है।
कविता समय के खिलाफ कैसे जीतती है? कविता—जल्दी नहीं करती, परिणाम नहीं माँगती, निष्कर्ष नहीं देती, वह कहती है— “मैं अभी हूँ, यही पर्याप्त है।” और यही तानाशाही का अंत है।
एक बिल्कुल अलग निष्कर्ष घड़ी हमें बताती है—“समय क्या है” कविता हमें याद दिलाती है—“समय से पहले भी हम थे” और समय के बाद भी कुछ बचा रहेगा। इसलिए—कविता समय के खिलाफ युद्ध नहीं, समय से बाहर निकलने की एक शांत दरार है।