समय अपने काँटे उतार देता है

जब तुम

कहीं पहुँचने की जल्दी छोड़ देते हो,

समय

अपने काँटे उतार देता है।

घड़ी तब भी चलती है,

पर

चुभती नहीं।

क्षण

अब माप नहीं होते,

वे

स्पर्श बन जाते हैं।

न अतीत

पीछे खींचता है,

न भविष्य

आगे डराता है—

समय

नंगा खड़ा रहता है।

यहाँ

हर पल

कोई परीक्षा नहीं,

कोई समय-सीमा नहीं।

समय

अब शिकारी नहीं,

साथ चलने वाला

मौन साथी है।

तुम रुकते नहीं,

पर

भागते भी नहीं—

और समय

अपने दाँत समेट लेता है।

इस निर्विवाद

ठहराव में

जीवन

घायल नहीं होता।

यहीं

समय

अपने काँटे उतार देता है,

और

क्षण

पहली बार

दर्दरहित

हो जाते 

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