पृथ्वी और जीवन

पृथ्वी
जीवन की पालना नहीं—
जीवन की
आदत है।

वह
जीवन को जन्म नहीं देती,
वह
जीवन को रोकती नहीं—
बस
उसे होने देती है।

जीवन
यहाँ किसी योजना से नहीं आया,
वह
एक चूक की तरह आया—
और फिर
ज़रूरत बन गया।

थोड़ा पानी,
थोड़ी गर्मी,
थोड़ी प्रतीक्षा—
और जीवन
अपना रास्ता
खुद खोज लाया।

पृथ्वी ने
जीवन से
कोई वादा नहीं किया।
न सुरक्षा का,
न स्थायित्व का,
न न्याय का।
उसने
सिर्फ़
जगह दी।

जीवन
उस जगह में
कभी काई बन गया,
कभी मछली,
कभी पक्षी,
कभी मनुष्य—
और हर बार
अपने को
सबसे ज़रूरी समझ बैठा।

पृथ्वी
हर रूप को
थोड़ी देर
सह लेती है।
फिर
उसे
मिट्टी में
लौटा लेती है—
बिना क्रोध,
बिना स्मृति।

पेड़
जीवन का धैर्य हैं।
वे
खड़े रहते हैं
तब भी
जब कुछ नहीं होता।
और मनुष्य—
वह जीवन है
जिसे
हर क्षण
कुछ होना चाहिए।

नदियाँ
जीवन को
बहना सिखाती हैं,
पर
हम
उन्हें
रोककर
सीखना चाहते हैं।

समुद्र
जीवन की सीमा है—
जहाँ पहुँचकर
हर रूप
अपने आकार को
भूल जाता है।

जीवन
पृथ्वी पर
कभी विजेता नहीं रहा।
वह
या तो
अनुकूल हुआ,
या
लुप्त।

पृथ्वी
जीवन को
मारती नहीं—
वह
सिर्फ़
संतुलन बदलती है।
और जब
संतुलन बदलता है,
तो
नाम बदल जाते हैं—
विलुप्ति,
आपदा,
नया युग।

हम
जीवन को
बचाने की बात करते हैं,
पर
जीवन
बचाया नहीं जाता—
वह
जिया जाता है
पृथ्वी की शर्तों पर।

यदि
हम
थोड़ा कम लें,
थोड़ा धीमे चलें,
और
थोड़ी देर
चुप रहें—
तो शायद
पृथ्वी
जीवन को
हमारे भीतर
और देर तक
रहने दे।

क्योंकि
पृथ्वी
हमारे बिना
जी सकती है।
पर
हम
पृथ्वी के बिना
एक पल भी नहीं।

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