पृथ्वी की धड़कन को सुनो
नहीं तो…

पृथ्वी की धड़कन

किसी घड़ी की टिक-टिक नहीं—

वह

मिट्टी के भीतर

चुपचाप चलती

जीवन की साँस है।

यह धड़कन

नदियों की चाल में है,

ऋतुओं के ठहराव में है,

बीज के अँधेरे में

रोशनी पर भरोसे में है।

हमने

तेज़ होने को ही

जीना समझ लिया,

और इस धड़कन को

बहुत धीमा मानकर

अनदेखा कर दिया।

जब हमने

उसकी गति तय करनी चाही,

उसके कंधों पर

अपने सपनों का बोझ रखा—

तभी

उसका दिल

थोड़ा हिचकने लगा।

पहले

हवा भारी हुई,

फिर

पानी बेचैन हुआ,

फिर

मिट्टी ने

अपने घाव दिखाने शुरू किए।

सूखा आया,

बाढ़ आई,

बीमारियाँ आईं—

ये

कोई सज़ा नहीं थीं,

ये

दिल की अनसुनी पुकार थीं।

अगर यह धड़कन

और बिगड़ी—

तो

पेड़ खड़े रहेंगे

पर छाया नहीं देंगे,

नदियाँ बहेंगी

पर प्यास नहीं बुझाएँगी।

और एक दिन

मनुष्य भी

यहाँ रहेगा—

पर

यहाँ का नहीं रहेगा।

अभी भी

सुनने का समय है।

पृथ्वी की धड़कन को सुनो,

नहीं तो…

एक दिन

हमारी धड़कन

उसे सुनने के लिए

कहीं नहीं बचेगी।

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