थोड़ा कम
हमने बहुत कुछ कर लिया—
इतना कि
पृथ्वी की साँस
हमारी योजनाओं के नीचे दब गई।
पेड़ों से पहले
हमने माप निकाले,
नदियों से पहले
हमने रास्ते तय किए,
हवा से पहले
हमने नाम रख दिए।
पृथ्वी
कुछ भी माँग नहीं रही थी—
न उत्पादन,
न प्रगति,
न हमारी सफलता।
वह बस
अपनी गति में
होना चाहती थी।
हम चलते गए
और उसे चलाते रहे,
खोदते गए
और उसे समझाते रहे
कि यह विकास है।
हर “काम”
एक घाव था,
और हर घाव पर
हमने आँकड़े रख दिए।
किसी दिन
पृथ्वी थक कर नहीं गिरी—
वह बस
धीरे-धीरे
हमारी आदतों से
दूर होने लगी।
अब भी
अगर कुछ बचा है
तो वह यही कि
हम
थोड़ा कम हों।
कम बोलें,
कम बदलें,
कम साबित करें,
कम जीतें।
ताकि
पेड़ फिर से
बिना अनुमति उग सकें,
नदियाँ
बिना लक्ष्य बह सकें,
और पृथ्वी
पहली बार
हमसे मुक्त होकर
स्वस्थ हो सके।
कम काम
सबसे बड़ा उपचार है।