1.घोषणापत्र: सड़कों का ज़मीर
यह समय
धीमे दुख का नहीं,
खुले प्रतिरोध का है।
अब शब्द
कागज़ पर नहीं,
दीवारों पर लिखे जाएँगे।
अब सवाल
कक्षाओं में नहीं,
चौराहों पर पूछे जाएँगे।
हमने बहुत देखा
दर्द का व्यापार,
आँकड़ों में बदलता बचपन,
और घोषणाओं में चमकती करुणा।
अब नहीं।
अब ज़मीर
नारा बनेगा—
“मनुष्य बिकाऊ नहीं।”
अब भीड़
भीड़ नहीं रहेगी,
जन बनेगी।
जब कहीं
निर्दोषता पर अँधेरा गिरे,
तो हर शहर
एक साथ जागे।
हर दरवाज़ा
एक दस्तक बने।
सत्ता से बड़ा
जन का प्रश्न होता है,
और प्रश्न से बड़ी
कोई क्रांति नहीं।
उठो—
कि अन्याय
सुविधा से डरता है,
पर संगठित आवाज़ से
काँपता है।
उठो—
कि सड़कों पर उतरता ज़मीर
इतिहास की दिशा मोड़ देता है।
और लिख दो
समय की पेशानी पर—
“जहाँ बचपन असुरक्षित है,
वहाँ कोई विकास नहीं।”
यह कविता नहीं,
घोषणा है—
कि हम चुप्पी की नागरिकता छोड़ते हैं
और प्रतिरोध के नागरिक बनते हैं।
2.ज़मीर सड़कों पर उतरे
अब काफी नहीं
कि ज़मीर भीतर जागे—
वह तो अक्सर
तकिये के नीचे दबकर
फिर सो जाता है।
अब ज़रूरी है
कि ज़मीर
जूते पहने,
दरवाज़ा खोले,
और सड़कों पर उतर आए।
जब कहीं
निर्दोषता कुचली जाए,
तो शहर की नींद टूटे,
दीवारें सवाल लिखें,
और भीड़
तमाशबीन नहीं
गवाह बने।
कितनी अजीब बात है—
हम मोमबत्तियाँ जलाते हैं
पर आग नहीं बनते,
पोस्ट लिखते हैं
पर आवाज़ नहीं उठाते।
वे बच्चे
हमारे घरों में जन्मे नहीं थे,
पर वे इसी पृथ्वी की संतान थे—
क्या पृथ्वी
हमारा घर नहीं?
ज़मीर अगर सचमुच ज़िंदा है,
तो वह
रैली बने,
नारा बने,
कानून से सवाल बने,
और सत्ता की आँख में
सीधी नज़र बने।
इतिहास बदलते हैं
वे लोग
जो दुख को
“ख़बर” नहीं,
“कारण” बना लेते हैं।
उठो—
कि चुप्पी भी
अपराध की परछाईं होती है।
उठो—
कि सड़कों पर उतरा ज़मीर
ही सभ्यता की
अंतिम उम्मीद है।
3.हमारी चुप्पी का द्वीप
कहते हैं
कहीं एक द्वीप है—
नक़्शों में नहीं,
हमारी सुविधा में छिपा हुआ।
जहाँ बचपन
समाचार की एक पंक्ति बनकर रह गया,
और चीखें
समुद्र ने नमक समझकर पी लीं।
हमने सुना,
सिर हिलाया,
और चैनल बदल दिया।
हमारे घरों में
बहसें गर्म रहीं—
शेयर, सौदे, चुनाव,
मैच का स्कोर।
उधर
निर्दोषता मदद माँगती रही,
इधर
हमने कहा—
“ये हमारी दुनिया नहीं।”
शायद सच यही है—
दर्द जब अपना नहीं होता,
तो नैतिकता भी
धीरे-धीरे पराई हो जाती है।
नारे दीवारों पर चमकते हैं—
बेटियों के नाम पर,
सम्मान के नाम पर,
भविष्य के नाम पर—
पर नारे
कभी नाव नहीं बनते
डूबते बचपन के लिए।
सबसे खतरनाक
हैवान नहीं,
हमारी आदत है—
दूर के दुःख को
दूर ही रहने देने की।
मैं पूछता हूं—
अगर दर्द की नागरिकता होती,
तो क्या हम तब भी चुप रहते?
और अंत में
समुद्र नहीं बोलेगा,
इतिहास बोलेगा—
कि एक समय था
जब चीखें थीं
और सभ्यता
टीवी की आवाज़ बढ़ा रही थी।
4.पूँजी का अँधेरा बाज़ार
कहते हैं
पूँजी सिर्फ़ सिक्का नहीं,
एक प्रशिक्षण है—
दिल को धीरे-धीरे पत्थर बनाने का।
पहले वह
संवेदना को “कमज़ोरी” कहती है,
फिर लाभ को “धर्म” बना देती है,
और मनुष्य को
चलती फिरती वस्तु।
जहाँ सब कुछ बिकाऊ हो जाए,
वहाँ
निर्दोषता भी माल बनती है,
और बचपन
सबसे सस्ता।
वे हैवान पैदा नहीं होते—
उन्हें गढ़ा जाता है
बोर्डरूम की रोशनी में,
जहाँ नैतिकता
ग्राफ़ की तरह ऊपर-नीचे होती है।
एक बच्ची की चीख
उनकी बैलेंस शीट में
सिर्फ़ “शोर” है,
और मुनाफ़ा
उस शोर को ढँक देता है।
पूँजी का असली चेहरा
न नोट है,
न बाज़ार—
वह वह क्षण है
जब कोई इंसान
दूसरे इंसान को
इंसान समझना छोड़ देता है।
पर इतिहास गवाह है—
हर अँधेरे बाज़ार के बाहर
कुछ लोग खड़े रहे हैं
दीपक लेकर।
वे कहते हैं—
मनुष्य बिकने की चीज़ नहीं,
और बचपन
किसी सभ्यता की अंतिम पवित्र जगह है।
जब आवाज़ें मिलती हैं,
तो साम्राज्य हिलते हैं।
और याद रखो—
हैवानियत संगठित हो सकती है,
पर प्रतिरोध
उससे बड़ा जन्म लेता है।
5. भूमंडलीकरण की मशीन
भूमंडलीकरण
लोहे की नहीं,
इच्छाओं और बाज़ार की बनी मशीन है—
जिसके दाँत
विज्ञापनों की चमक से ढके हैं।
वह सीधे मांस नहीं खाती,
पहले सपने खाती है,
फिर बचपन की हँसी,
फिर मनुष्य की नींद।
उसकी भूख का कोई धर्म नहीं,
कोई देश नहीं,
सिर्फ़ लाभ की भाषा है
और आँकड़ों की जीभ।
कभी वह
गाँव की मिट्टी से खेलते हाथ
शहर की फैक्ट्रियों में बदल देती है,
कभी मासूम आँखों की रोशनी
स्क्रीन की नीली कैद में भर देती है।
उसके पेट में
स्टॉक-मार्केट की हलचल है,
उसकी आँतों में
मुनाफ़े का गणित।
और बाहर—
हम देखते हैं
चमकते मॉल,
ऊँची इमारतें,
और सोचते हैं
सभ्यता आगे बढ़ रही है।
पर कहीं
धीरे-धीरे
मनुष्यता का रक्तचाप गिर रहा है।
मै पूछता हूं—
क्या विकास वही है
जहाँ दिल की जगह
डॉलर धड़कते हों?
एक दिन
जब मशीन थकेगी,
शायद कोई बच्चा
मिट्टी से फिर
मनुष्य का चेहरा बनाएगा—
और कहेगा,
“दुनिया बाज़ार नहीं,
घर भी होती है।