जैसे सुबह बिना आग्रह उगती है,
जैसे रात बिना अपराध उतरती है।
होने दो
हवा को—
कि वह बिना पक्ष लिए
सबके बीच से गुज़रती रहे।
होने दो
प्रकाश को—
कि वह उजाले का अहं न पाले,
सिर्फ़ दिखा कर चला जाए।
और अंधकार को भी होने दो—
वही तो गहराई देता है
जहाँ बीज चुपचाप आकार लेते हैं।
होने दो
फूल को—
कि वह क्षण भर महके
और गिरना भी सीखे।
कांटों को भी होने दो—
वे याद दिलाते हैं
कि स्पर्श भी सजगता माँगता है।
होने दो
सुख को—
कि वह मेहमान की तरह आए,
घर का मालिक न बने।
दुख को भी होने दो—
वह भीतर की अनसुनी जगहों में
रोशनी रख जाता है।
और अंत में—
मुझे भी होने दो
जैसे आकाश होता है—
न पकड़ता,
न ठुकराता,
सिर्फ़ जगह देता हुआ।
होने दो—
क्योंकि होना ही
अस्तित्व की सबसे शांत प्रार्थना है।