स्वचालित और संचालित मनुष्य का विलाप



तुम जीते नहीं—
तुम्हें जिया जा रहा है।

किसी अदृश्य उँगली ने
तुम्हारे भीतर
एक बटन दबाया है—
और तुम
दिन भर चलते रहते हो।



सुबह उठते हो—
पर जागते नहीं।

आँखें खुलती हैं,
पर भीतर
अब भी अंधेरा जमा रहता है—
एक अनजागृत-प्रभात
जिसमें
तुम्हारा “मैं”
अब तक सो रहा होता है।



तुम्हारे विचार
तुम्हारे नहीं—
वे
उधार के प्रतिध्वनि-बीज हैं,
जो समाज ने
धीरे-धीरे
तुम्हारे मस्तिष्क में बो दिये हैं।

तुम सोचते हो—
“मैं सोच रहा हूँ”
पर सच यह है—
तुम्हारे भीतर कोई और सोच रहा है।



तुम हँसते हो—
पर वह हँसी
तुम्हारी नहीं होती,
वह
सीखी हुई प्रतिक्रिया होती है।

तुम रोते हो—
पर आँसू
तुम्हारे नहीं गिरते,
वे
अधूरे अनुकरण होते हैं।



तुम प्रेम करते हो—
या सिर्फ
प्रेम की नकल?

तुम क्रोधित होते हो—
या किसी पुरानी छाया
को दोहराते हो?

तुम जीते हो—
या बस
जीने का अभिनय करते हो?



देखो—

तुम्हारे कदम
तुम्हें नहीं ले जा रहे,
वे
तुम्हें ढो रहे हैं—
एक स्वचालित-पथ पर
जहाँ
कोई प्रश्न नहीं पूछता।



तुम्हारा मस्तिष्क—

न्यूरॉन्स का जाल नहीं,
एक अनुकरण-कारागार है,

जहाँ हर विचार
पहले से तय है,
हर प्रतिक्रिया
पहले से लिखी हुई—

और तुम
उसे “स्वतंत्रता” कहते हो।



सबसे बड़ा भ्रम—

तुम मानते हो
कि तुम “निर्णय” लेते हो।

पर निर्णय
तुमसे पहले ही
ले लिये जाते हैं—

तुम बस
उन्हें
अपने नाम से घोषित कर देते हो।



और सबसे तीखा सच—

तुम
एक क्षण भी
अपने साथ नहीं होते।

तुम्हारा शरीर यहाँ है,
तुम्हारा मन कहीं और—

तुम्हारा जीवन
हमेशा
अनुपस्थिति में घटता है।



तुम खाते हो—
पर स्वाद नहीं जानते।

तुम चलते हो—
पर धरती को नहीं छूते।

तुम जीते हो—
पर जीवन
तुमसे कभी नहीं मिलता।



और फिर—

एक दिन
सब कुछ समाप्त हो जाएगा।

और तुम
आखिरी बार पूछोगे—

“क्या मैं कभी जिया भी था?”



यह प्रश्न
तुम्हें नहीं छोड़ेगा—

क्योंकि
तुम्हारा पूरा जीवन
एक अनजागृत-संस्करण था,
जिसमें
तुम थे ही नहीं।



पर अभी भी—

यहीं—
इसी क्षण—

एक संभावना है।

यदि तुम
बस एक बार
रुककर देख सको—

कि तुम
कैसे जी रहे हो,

तो
यह स्वचालितता
टूट सकती है।



और तब—

पहली बार
तुम नहीं जीओगे—

जीवन तुममें जागेगा।

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