ब्रह्मांड में
मनुष्य की
कोई उपयोगिता नहीं है।
तारे
मनुष्य के बिना भी
जलते रहे,
आकाशगंगाएँ
मनुष्य के बिना भी
घूमती रहीं।
न किसी सुपरनोवा ने
हमसे अनुमति ली,
न किसी ब्लैक होल ने
हमारी उपस्थिति दर्ज की।
पृथ्वी पर भी—
मनुष्य की
कोई उपयोगिता नहीं है।
नदियाँ
हमारे आने से पहले
बहती थीं,
और शायद
हमारे बाद
ज़्यादा साफ़ बहेंगी।
पेड़ों को
हमारी भाषा नहीं चाहिए,
पर्वतों को
हमारे अर्थ नहीं।
हम उपयोग नहीं हैं—
हम
हस्तक्षेप हैं।
हमने
अपने होने को
इतना ज़रूरी मान लिया
कि हर संतुलन
हमारे चारों ओर
घूमने लगा।
जबकि जीवन
हमारे बिना भी
पूरा था।
इसलिए
मैं जाना चाहता हूँ
उसी सादगी से
जिस सादगी से
मैं आया था—
बिना यह साबित किए
कि मैं ज़रूरी हूँ,
बिना यह माँगे
कि मेरी कमी
महसूस की जाए।
मैं नहीं चाहता
कि मेरे जाने से
कुछ सुधरे—
क्योंकि सुधार
भी एक मानवीय
अहंकार है।
मैं बस
इतना चाहता हूँ
कि ब्रह्मांड
थोड़ा और
अपने जैसा हो जाए।
और मनुष्य
एक दिन
यह सीख ले—
कि उपयोगिता के बिना भी
होना
संभव है।
यही
मेरे जाने का
सबसे शांत
तर्क है।