मनुष्य मात्र को इतिहास और राजनीति नहीं एक कविता चाहिए—

कविता
जो उसे बताए कि वह
सिर्फ़ घटनाओं का परिणाम नहीं है,
कि वह केवल तारीख़ों के बीच
दबा हुआ कोई नाम नहीं।

उसे एक ऐसी कविता चाहिए
जो युद्ध से लौटे हाथों पर
धीरे से पानी रख दे,
जो भाषणों से थके कानों को
थोड़ी देर के लिए
चुप्पी दे सके।

इतिहास उसे बताता है
किसने किसे हराया,
राजनीति समझाती है
किसे क्या मानना है—
पर कविता
उसे यह याद दिलाती है
कि वह रो सकता है
बिना हार माने,
कि वह प्रेम कर सकता है
बिना अनुमति माँगे।

मनुष्य को कविता चाहिए
क्योंकि उसके भीतर
ऐसी जगहें हैं
जहाँ न कानून पहुँचते हैं
न तर्क।

जहाँ केवल
एक अस्पष्ट-सी पीड़ा होती है,
एक अनकहा डर,
और एक छोटी-सी उम्मीद
जो किसी घोषणा-पत्र में
फिट नहीं बैठती।

इतिहास उसे खड़ा करता है
किसी कतार में,
राजनीति उसे सिखाती है
नारे लगाना—
कविता
उसे कतार से अलग बुलाती है,
और धीरे से पूछती है—
“तुम ठीक हो?”
मनुष्य को कविता चाहिए
क्योंकि हर दिन
उससे कुछ छीना जाता है—
समय, भरोसा, स्पर्श—
और कविता
उसे कुछ लौटाती नहीं,
बस यह भरोसा देती है
कि जो खो गया है
वह व्यर्थ नहीं था।

इतिहास भविष्य का बोझ देता है,
राजनीति वर्तमान का शोर—
कविता
क्षण भर के लिए
मनुष्य को
उसके होने में
ठहरा देती है।

और कभी-कभी
यही ठहराव
सभ्य रहने की
अंतिम संभावना होता है।

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