ब्रह्मांड
कभी जल्दी में नहीं होता।
उसके पास
कहीं पहुँचने की योजना नहीं है।
तारे
समय पर नहीं उगते,
वे बस
उगते हैं।
आकाशगंगाएँ
लक्ष्य नहीं बनातीं,
वे दिशा में नहीं,
सजगता में चलती हैं।
ब्रह्मांड
नियत से नहीं,
संवेदन से संचालित है—
हर क्षण
पूरा।
इसीलिए वहाँ
कोई घबराहट नहीं,
कोई दौड़ नहीं,
कोई “अभी नहीं तो कब?” नहीं।
जीवन भी
जब सच होता है
तो ऐसे ही चलता है—
घड़ी के विरुद्ध नहीं,
अपनी भीतर की
लय में।
जो जल्दी करता है
वह समय से हारता है।
जो सजग रहता है
वह समय बन जाता है।
नियम यही है—
नियत छोड़ो,
ध्यान पकड़ो।
क्योंकि
ब्रह्मांड
कभी सफल होने नहीं निकला,
वह सिर्फ़
जागते हुए घटता रहता है।