पृथ्वी : मुनाफ़े के नीचे दबी साँस

हमने पृथ्वी को
माँ नहीं—
खदान कहा,
उसकी देह को
नक़्शा,
और हृदय को
संसाधन।


मुनाफ़े की अंधी दौड़ में
आँखें दौड़ती रहीं,
पर देखा नहीं—
कि पहाड़ों की पसलियाँ
एक-एक कर
गिनती में बदल दी गईं।


नदियाँ अब
जल नहीं बहातीं,
वे
कारख़ानों का
थका हुआ
पसीना ढोती हैं।
उनके किनारों पर
मछलियाँ नहीं—
रिपोर्टें मरी पड़ी हैं।


जंगल—
जो कभी पृथ्वी के फेफड़े थे,
अब
लकड़ी के आँकड़ों में
सिकुड़ गए हैं।
हर कटे पेड़ के साथ
एक भविष्य
बिना शोर के
गिर पड़ा।


धरती के सीने पर
गहरे घाव हैं—
खुले, रिसते हुए,
पर हमने उन पर
सीमेंट चढ़ा दिया
और नाम रख दिया
विकास।


पृथ्वी चिल्लाती नहीं,
वह
धीरे-धीरे
बीमार पड़ती है—
तापमान उसका बुख़ार है,
सूखा उसका निर्जल रोना,
और बाढ़
उसके भीतर भरे
आँसुओं का
फूट पड़ना।


हम पूछते हैं—
“फ़ायदा कितना हुआ?”
पृथ्वी पूछती है—
“अब बचेगा कौन?”
मुनाफ़ा
जिस दिन
अंतिम पेड़ के नीचे
हिसाब लगाएगा,
उस दिन
हवा के लिए
कोई कॉलम नहीं बचेगा।


सुनो—
यह कविता नहीं,
चेतावनी है।


पृथ्वी मर नहीं रही—
उसे
मुनाफ़े के नाम पर
धीरे-धीरे
मार दिया जा रहा है।
और सबसे भयानक बात यह है—
इस हत्या में
हम सब
हिस्सेदार हैं।

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