पृथ्वी की मेडिकल रिपोर्ट
पृथ्वी : एक जीवित शरीर
यह कोई रूपक नहीं है,
कोई भावुक कल्पना नहीं—
यह एक ठोस, धीमा,
और अब तक पूरी तरह न समझा गया
वैज्ञानिक तथ्य है।
पृथ्वी
एक आर्गेनिक—
जीवित शरीर है।
इसका कोई बाहर नहीं,
कोई “पर्यावरण” नहीं—
सब कुछ
इसके भीतर घटित होता है।
हम
इस पर नहीं रहते,
हम
इसके भीतर होते हैं।
नदियाँ
इसकी रक्तवाहिनियाँ हैं—
वे केवल पानी नहीं ढोतीं,
वे
पोषण, ताप, खनिज, स्मृति
एक अंग से दूसरे अंग तक
चुपचाप पहुँचाती हैं।
जहाँ नदी रुकती है,
वहाँ
किसी नस में थक्का जमता है।
पहाड़
इसकी हड्डियाँ हैं—
स्थिर, भारी,
और बोझ उठाए हुए।
वे
धरती को ऊँचा नहीं करते,
वे
धरती को संभालते हैं।
जब पहाड़ कटते हैं,
तो
शरीर का संतुलन
डगमगाता है।
जंगल
इसके फेफड़े हैं—
न दिखाई देने वाली
पर सबसे ज़रूरी श्वास।
हर पेड़
एक साँस है
जो पृथ्वी
अपने लिए नहीं,
हमारे लिए लेती है।
हवा
इसका श्वसन तंत्र है—
बहती हुई,
स्वयं को साफ करती हुई,
हर जीव को छूती हुई।
जब हवा बीमार होती है,
तो
यह एलर्जी नहीं—
यह
संक्रमण होता है।
तापमान
इसका थर्मोस्टैट है—
सूक्ष्म, संतुलित,
हज़ारों वर्षों से
अपने भीतर सेट।
हमने
उसमें
अचानक हाथ डाल दिया—
और अब
पूरा शरीर
काँप रहा है।
बैक्टीरिया, वायरस
इसके शत्रु नहीं—
वे
इसकी प्रतिरक्षा प्रणाली हैं।
वे तय करते हैं
कहाँ अति हो गई है,
कहाँ सफ़ाई ज़रूरी है।
जब वे बढ़ते हैं,
तो
यह दंड नहीं—
यह
शरीर की चेतावनी होती है।
मनुष्य
इस शरीर का मस्तिष्क नहीं है—
हम
एक जटिल कोशिका हैं।
उपयोगी हो सकते हैं,
विनाशकारी भी।
जब कोशिका
अपने ही शरीर को
निगलने लगे—
तो
उसे
कैंसर कहा जाता है।
यहाँ कोई मालिक नहीं है,
कोई शासक नहीं।
यह शरीर
किसी को हटाता नहीं—
यह
संतुलन लौटाता है।
धीरे,
निर्दय नहीं—
बस
निष्पक्ष।
आप इसे
पूजें या न पूजें—
इससे फर्क नहीं पड़ता।
लेकिन
यदि आप
इसे
मृत समझते हैं,
तो
आप
इसके संकेत नहीं सुन पाएँगे।
और याद रखिए—
जीवित शरीर
चिल्लाता नहीं।
वह
पहले
बुखार देता है,
फिर
सूजन,
फिर
थकान।
और जब
वह मौन हो जाए—
तो समझिए
वह
ठीक नहीं,
ख़त्म होने के करीब है।
अभी
पृथ्वी जीवित है।
दुखी है,
थकी है,
पर जीवित है।
और
जो शरीर
अब भी जीवित हो—
वह
सुनने की उम्मीद
अब भी रखता है।
यह कविता
न चेतावनी है,
न आंदोलन—
यह
एक मेडिकल रिपोर्ट है।
और रिपोर्ट
कहती है—
मरीज़ अभी बच सकता है।