मैं तुमसे
कुछ माँगने नहीं आई हूँ,
मैंने कभी
माँगा भी नहीं।
मैंने तो
तुम्हें
चुपचाप सहा है—
हर खनन,
हर कटाव,
हर जल्दबाज़ी के साथ।
जब तुम थकते हो
तो आराम करते हो,
जब मैं थकती हूँ
तो भी
मुझे काम पर लगा देते हो।
मैंने
तुम्हारी भूख को
अन्न दिया,
तुम्हारे डर को
आश्रय दिया,
और तुम्हारी महत्वाकांक्षा को
अपनी हड्डियों से
रास्ता बना दिया।
अब भी
मैं क्रोधित नहीं हूँ—
बस
थोड़ी भारी हूँ।
अगर हो सके
तो
मेरे जंगलों को
योजनाओं से मत भरो,
मेरी नदियों को
समाधान मत बनाओ,
मेरी हवा को
उपयोग की भाषा में
मत तोलो।
मुझे सुधारने मत आओ,
मैं टूटी नहीं हूँ—
मैं बस
बहुत समय से
सो नहीं पाई हूं।
मुझ पर
कम चलो,
कम लिखो,
कम जीतो।
कभी-कभी
बस
मेरे पास
बैठ जाओ।
मैं ठीक हो जाऊँगी
अगर
तुम
थोड़ा
रुक सको।
— पृथ्वी