पृथ्वी : एक धीमी, अनसुनी देह

सुबह

जब पृथ्वी आँख खोलती है,

तो सूरज

कोई देवता नहीं होता—

बस

पलकों पर रखी

एक हल्की गरमी होती है।

वह

अपना वजन बदलती है,

महाद्वीप

थोड़ा-सा खिसकते हैं,

जैसे नींद में

किसी जीव की हड्डियाँ

आहिस्ता करवट लेती हों।

समुद्र

उसका मन है—

कभी भरा,

कभी खाली।

ज्वार

उसके विचार हैं,

जो लौट आते हैं

हर बार

कुछ कहे बिना।

नदियाँ

उसकी लिखावट हैं—

लंबी,

टेढ़ी,

और जगह-जगह

मिटती हुई।

वह हर साल

अपने ही हाथ से

ख़ुद को

दोबारा लिखती है।

जंगल

उसकी पलकों की छाया हैं—

जब वे झपकती हैं

तो

दिन ठंडा हो जाता है

जब वे झड़ती हैं,

तो

धरती को

नींद नहीं आती।

हवा

उसकी आवाज़ नहीं—

उसकी साँस की आवाज़ है।

जब वह

साफ़ बहती है,

तो

पृथ्वी बोलती नहीं—

बस

जीती है।

पत्थर

उसकी याददाश्त हैं

वे

कुछ नहीं कहते,

लेकिन

सब कुछ

याद रखते हैं—

पैरों के निशान,

आग की कहानियाँ,

पानी की उम्र।

रात को

पृथ्वी

तारों से

कुछ पूछती नहीं।

वह

बस

थोड़ी देर

खुला रहना चाहती है—

जैसे

किसी जीव को

अकेले में

खुली साँस चाहिए।

मनुष्य

उसकी सबसे बेचैन कोशिका है—

जो

खुद को

पूरा शरीर समझ बैठी।

वह

बहुत कुछ बना सकती है,

पर

अक्सर

बहुत जल्दी में होता है

इसीलिए बहुत कुछ छूटता 

जाता है।

पृथ्वी

हमसे नाराज़ नहीं है

वह

बस

हमारी गति से

थक गई है।

अगर हम

एक दिन

थोड़ा धीरे चलें,

तो शायद

वह भी

हमें

फिर से

अपनी देह में

ठहरने दे

क्योंकि

पृथ्वी

कहीं जा नहीं रही—

वह

यहीं है।

बस

यह देख रही है

कि

हम

उसके साथ

रहने लायक

अब भी हैं

या नहीं।

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