ध्यान के बिना भाषा: मात्र शोर

ध्यान के बिना भाषा

अधिक होती है, लेकिन शोर बन जाती है

यही कारण है कि: बहुत बोलने वाले युग में अर्थ ग़ायब है।

1. ध्यान के बिना भाषा = अधिक, पर अर्थ नहीं

ध्यान भाषा का आंतरिक गुरुत्व है। जब ध्यान नहीं होता— शब्द निकलते हैं, पर ठहरते नहीं वाक्य बनते हैं, पर उतरते नहीं, आवाज़ होती है, पर उपस्थिति नहीं, भाषा तब केवल, ध्वनि–उत्पादन बन जाती है, अर्थ–उत्पत्ति नहीं।

     यही कारण है कि आज शब्द तेज़ हैं, पर गहरे नहीं।

2. शोर क्या है? शोर = बिना साक्षी के गति

  शोर ऊँची आवाज़ नहीं होता।

 शोर वह भाषा है जिसमें—

 बोलने वाला खुद को नहीं सुन रहा

 सुनने वाला खुद से जुड़ा नहीं

 शब्द किसी को स्पर्श नहीं कर रहे

 शोर में शब्द प्रतिक्रिया होते हैं,

 संवाद नहीं।

 ध्यान के बिना बोली गई भाषा

अपने ही प्रतिध्वनि–कक्ष में घूमती रहती है।

3. बहुत बोलने वाला युग क्यों आया?

क्योंकि यह युग—

चुप रहने से डरता है

खालीपन से घबराता है

मौन को कमजोरी समझता है

आज का मनुष्य

बोलता है ताकि—

उसे सोचना न पड़े

उसे महसूस न करना पड़े

उसे अपने भीतर उतरना न पड़े

इसलिए भाषा

ढाल बन गई है,

द्वार नहीं।

4. अर्थ कहाँ से पैदा होता है?

अर्थ शब्दों से नहीं आता।

अर्थ आता है—

ठहराव से

संवेदनशीलता से

मौन से

ध्यान = शब्दों के बीच की जगह

उसी जगह में अर्थ साँस लेता है।

जब ध्यान नहीं— तो शब्द एक-दूसरे से टकराते हैं, जुड़ते नहीं।

5. सोशल मीडिया का उदाहरण

आज हर कोई बोल रहा है

लेकिन—

सुनने वाला कोई नहीं

ठहरने वाला कोई नहीं

पोस्ट = प्रतिक्रिया

कमेंट = प्रतिक्रिया

रील = उत्तेजना

यह भाषा का अति-उत्पादन है,

अर्थ का अकाल।

6. ध्यान क्या करता है भाषा के साथ?

ध्यान भाषा को—

धीमा करता है

गहरा करता है

ज़िम्मेदार बनाता है

ध्यान में बोला गया एक वाक्य

हज़ार बिना-ध्यान शब्दों से भारी होता है।

क्योंकि उसमें

बोलने वाला भी मौजूद होता है।

7. इसलिए अर्थ ग़ायब है

क्योंकि—

भाषा से पहले ध्यान नहीं

शब्द से पहले मौन नहीं

कथन से पहले अनुभूति नहीं

जब भाषा अनुभव से नहीं,

हड़बड़ी से जन्म लेती है,

तो वह शोर बनती है।

8. अंतिम सूत्र

ध्यान के बिना भाषा

अधिक होती है

लेकिन शोर बन जाती है

क्योंकि भाषा का धर्म

अभिव्यक्ति नहीं,

संप्रेषण है।

और संप्रेषण के लिए

दोनों ओर चेतना चाहिए।

बहुत बोलने वाले युग में

अर्थ ग़ायब है

क्योंकि अर्थ

भीड़ में नहीं,

मौन में दिखाई देता है।

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