धरती का मौन इंटरनेट

धरती के भीतर
जहाँ अँधेरा केवल अँधेरा नहीं—
वहाँ रौशनी की एक
बिना चमक वाली भाषा बहती है।

जड़ों के नीचे,
मिट्टी की नसों में
फंगस का महीन जाल
कोई तार नहीं—
फिर भी संदेश।

एक वृक्ष
जब बीमार होता है
तो उसकी पीड़ा
हवा में नहीं रोती—
मिट्टी में फुसफुसाती है।

दूर खड़ा दूसरा वृक्ष
उस फुसफुसाहट को
शब्द नहीं,
पोषण बनाकर सुनता है—
और जवाब में
अपनी शक्ति भेज देता है।

यहाँ कोई सर्वर नहीं,
कोई पासवर्ड नहीं—
फिर भी
स्मृति है,
सहयोग है,
और नैतिकता भी।

बूढ़े पेड़
अपने अनुभव
नन्ही पौधों को सौंपते हैं—
जैसे दादी
रोटी बेलते हुए
जीवन का अर्थ सिखा दे।

यह नेटवर्क
मुनाफ़े से नहीं चलता,
स्पीड से नहीं,
बल्कि
करुणा की गति से।

हमारा इंटरनेट
सूचनाएँ जोड़ता है,
यह मायसेलियम
जीवन जोड़ता है।
हमने तार बिछाए,
उन्होंने विश्वास।
हमने “कनेक्शन” बनाए,
उन्होंने
सम्बंध।

शायद इसलिए
धरती अब भी
हमारी भूलों के बाद भी
हमसे बात करना
बंद नहीं करती—
क्योंकि
उसके पास
फंगस की
शांत,
अदृश्य
और अत्यंत संवेदनशील
भाषा है।

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