जो प्रश्न नहीं पूछता वहीं हमें टिकाए रखता है

1.कविता : रीढ़ — जीवन का स्तम्भ

पीठ में रीढ़ है—
सीधी नहीं,
बल्कि धैर्य की तरह
हल्की-सी मुड़ी हुई।
यदि वह पूरी तरह सीधी होती,
तो जीवन टूट जाता।
यदि बहुत झुक जाती,
तो चलना असंभव हो जाता।

रीढ़ का हर मोड़
एक समझौता है—
भार और लचीलापन
के बीच किया गया
सटीक समझौता।

उसके भीतर
संदेश दौड़ते हैं
बिजली की तरह—
बिना आवाज़,
बिना थकान।
एक क्षण में
पैर जान लेते हैं
कि ज़मीन कहाँ है।

रीढ़ केवल संरचना नहीं,
यह विश्वास की तकनीक है—
कि शरीर गिरेगा नहीं,
कि संतुलन लौट आएगा।

हर कशेरुकी
जीवन की एक इकाई है—
न बहुत स्वतंत्र,
न पूरी तरह बँधी हुई।
जुड़ी हुई,
पर दबी नहीं।

रीढ़ जानती है
कि क्षमता का अर्थ
कठोरता नहीं होता—
वह जानती है
कब झुकना है,
कब थामना है।

यहीं विज्ञान
आध्यात्मिक हो जाता है—
जब हम समझते हैं
कि स्थिरता
जड़ता नहीं,
और गति
उतावलापन नहीं।

रीढ़ ध्यान नहीं करती,
पर उसी पर
हर ध्यान टिका होता है।
जब हम खड़े होते हैं,
तो कोई चमत्कार नहीं होता—
बस रीढ़
अपना काम कर रही होती है
पूरी निष्ठा से।

और शायद
यही जीवन का
सबसे बड़ा रहस्य है—
जो हमें सँभालता है,
वह कभी
अपनी उपस्थिति
जताता नहीं।


2.कविता : पीठ के सपने

पीठ भी सपने देखती है—
पर वे सामने नहीं आते,
वे बोझ बनकर
धीरे-धीरे
कद में बदल जाते हैं।

ये वे सपने हैं
जिन्हें आँखों ने कभी माँगा नहीं,
पर जीवन ने
चुपचाप सौंप दिए।

पीठ के सपने
चमकते नहीं—
वे भार की तरह
दिन के भीतर उतरते हैं,
और रात को
थकान का आकार ले लेते हैं।

इन सपनों में
कोई उड़ान नहीं होती,
केवल संतुलन होता है—
गिरने और खड़े रहने के बीच
एक पतली-सी रेखा।

जब चेहरा
भविष्य की ओर मुस्कराता है,
पीठ अतीत को
संभालकर खड़ी रहती है।

पीठ के सपने
पूरे नहीं होते,
वे निभाए जाते हैं—
जैसे
एक लगातार चलता हुआ दिन
जिसका कोई त्यौहार नहीं।

और जब कोई पूछता है—
“तुम्हारे सपने क्या हैं?”
पीठ चुप रहती है,
क्योंकि उसके सपनों को
कहने के लिए
भाषा नहीं,
धैर्य चाहिए।

कभी-कभी
जब पीठ दुखती है,
तो समझ में आता है—
कोई सपना
हद से ज़्यादा
जी लिया गया है।

पीठ के सपने
दिखते नहीं,
पर उन्हीं पर
हमारा पूरा जागरण टिका होता है।


3.कविता : जीवन का ताप

पीठ की चेतना
लक्ष्य नहीं बदलती—
वह तो मानचित्र को छूती भी नहीं,
बस काग़ज़ का ताप बदल देती है।

जैसे चूल्हे पर रखा पानी
आग से दिशा नहीं पूछता,
सिर्फ़ उबलने का ढंग बदलता है।

पीठ जागती है
तो समय घड़ी से उतरकर
रीढ़ में बैठ जाता है—
टिक-टिक नहीं करता,
गरमाहट बन जाता है।

तब रास्ता वही रहता है,
पर कदमों में
धातु की जगह
मिट्टी की स्मृति आ जाती है।

पीठ की चेतना
जीवन को तेज़ नहीं करती,
वह उसे
अधिक संभव बना देती है—
जैसे सर्दियों में
धूप का होना।

उस क्षण
थकान दुश्मन नहीं रहती,
वह शरीर की भाषा बन जाती है—
एक धीमी आग
जो बुझती नहीं,
बस जलने का शोर छोड़ देती है।

लक्ष्य वहीं खड़ा रहता है,
पर अब हम
उसकी ओर नहीं दौड़ते—
हम अपने भीतर
उसी ताप के साथ चलते हैं
जिसमें रुकना भी
गति का एक रूप है।

पीठ की चेतना
जीवन को अर्थ नहीं देती,
वह उसे
सहनशील ऊष्मा देती है—
जिसमें
होना
जलन नहीं करता।


4.कविता : उन्हें ढोने वाले

जो प्रश्न नहीं पूछता,
वही हमें टिकाए रखता है—
जैसे धरती
कभी हमसे यह नहीं पूछती
कि हम उस पर क्यों खड़े हैं।

सभ्यता प्रश्न पूछने वालों से चलती है—
वे नक़्शे बनाते हैं,
सीमाएँ खींचते हैं,
भविष्य को नाम देते हैं।

पर जीवन उन्हें ढोने वालों से चलता है—
जो चुपचाप
दिन उठाते हैं,
रातें सहते हैं,
और अगली सुबह फिर खड़े हो जाते हैं।
वे इतिहास नहीं लिखते,
वे इतिहास को सम्भव बनाते हैं।

उनकी पीठ पर
शहर टिका होता है,
पर शहर उनकी ओर
कभी पलटकर नहीं देखता।

प्रश्न करने वालों के नाम
तख़्तियों पर होते हैं,
पर संसार का भार
उनके नाम के बिना चलता है।

जो पूछता नहीं,
वह खाली नहीं होता—
वह इतना भरा होता है
कि प्रश्न की जगह ही नहीं बचती।

और जब वह टूटता है,
तो सभ्यता काँपती है—
क्योंकि तब पता चलता है
कि आधार भी थक सकता है।

5.कविता : जो हमें चलाता है
जिसे हम महसूस नहीं करते
वही हमें चलाता है—
जैसे हवा पत्ते को
और समय हमें।

पीठ हमारे चलने की शर्त है,
पर वह अनुभव नहीं बनती—
वह आधार है,
जो कभी संवाद में नहीं आता।

हम आगे बढ़ते हैं
और पीछे का पूरा संसार
हमारे साथ चलता रहता है—
बिना आवाज़,
बिना शिकायत।

अस्तित्व की सबसे निर्णायक चीज़ें
हमेशा चेतना के बाहर रहती हैं—
जैसे गुरुत्व
जिसे कोई देखता नहीं
पर कोई टाल भी नहीं सकता।

हम उन्हें तभी पहचानते हैं
जब वे टूटने लगती हैं—
जब पीठ दुखती है,
जब समय चुभने लगता है,
जब साँस अपनी उपस्थिति जताती है।

तब हमें याद आता है—
कि जो चुप था, वही सच था,
और जो दिख रहा था
वह सिर्फ़ भ्रम की रोशनी थी।

हम चल नहीं रहे थे,
हमें चलाया जा रहा था—
उस मौन द्वारा
जो कभी सामने नहीं आता,
पर कभी साथ छोड़ता भी नहीं।

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