जीवन-जागृति का अंतरस्वर
जीवन
बस घटता नहीं—
वह
अपने घटने की खबर भी रखता है कहीं।
एक धड़कन
सिर्फ रक्त नहीं बहाती,
वह अपने ही बहाव को
अंदर से सुनती है—
जैसे नदी
अपने ही जल का स्पर्श
पहली बार जान रही हो।
मैं चलता हूँ—
पर चलना ही सब कुछ नहीं,
मेरे भीतर
एक और “मैं” है
जो देखता है
कि मैं चल रहा हूँ।
दो परतें—
एक जीती हुई,
एक जानती हुई—
और दोनों के बीच
एक अदृश्य सेतु
जिसे कोई शब्द नहीं छू पाता।
जीवन
एक अनवरत-प्रवाहिका,
और जागरूकता
उस प्रवाह का
स्वप्रकाश-प्रतिबिंब—
जहाँ
हर क्षण
दो बार जन्म लेता है:
पहले होता है,
फिर
महसूस होता है।
एक पत्ता हिलता है—
वह जीवन है,
पर जब वह हिलना
मेरे भीतर
एक सूक्ष्म कंपन बनता है—
वह जागरूकता है।
तब
हवा बाहर नहीं रहती,
वह
मेरे भीतर चलने लगती है।
कभी
मैं सिर्फ सांस लेता हूँ—
और कभी
मैं
सांस को लेते हुए
देखता हूँ।
वहीं—
वहीं एक द्वार खुलता है,
जहाँ
जीवन
अपने ही अस्तित्व को
धीरे-धीरे
छूने लगता है।
मेरे भीतर
न्यूरॉन्स नहीं,
अनुभव-नक्षत्र हैं—
वे जुड़ते हैं
तो एक विचार नहीं,
एक आकाशगंगा बनती है—
जहाँ
हर स्पंदन
एक अर्थ नहीं,
एक “होने का उजास” है।
जीवन
बिना जागरूकता के
एक बहती हुई कथा है,
जिसे कोई नहीं पढ़ता—
और जागरूकता
बिना जीवन के
एक रिक्त पृष्ठ—
जिस पर कुछ लिखा ही नहीं गया।
पर जब दोनों मिलते हैं—
तो
कथा स्वयं को पढ़ने लगती है,
और पृष्ठ
अपने ही अक्षरों से
चमक उठता है।
मैं
सिर्फ जीवित नहीं हूँ—
मैं
अपने जीवित होने का
साक्ष्य हूँ।
मैं
सिर्फ अनुभव नहीं हूँ—
मैं
अनुभव के होने की
अनुभूति हूँ।
और तब—
जीवन
एक घटना नहीं रहता,
वह
एक जाग्रत-उद्भव बन जाता है,
जहाँ
हर क्षण
अपने होने की रोशनी में
दोबारा जन्म लेता है।
शायद
यही सबसे गहरा रहस्य है—
कि
जीवन होना पर्याप्त नहीं,
उसे
जागरूकता में
महसूस होना ही
उसकी पूर्णता है।
और मैं—
उस पूर्णता का
एक छोटा-सा बिंदु नहीं,
बल्कि
वह स्थान हूँ
जहाँ
जीवन
स्वयं को
पहली बार
जान रहा है।