चौकीदार वृक्ष का उत्तर
(कुंवर नारायण की कविता ‘एक वृक्ष की हत्या’ से उपजी)

तुम जब लौटे
और मुझे नहीं पाया,
तो समझे
कि मैं कट गया हूँ।

नहीं दोस्त,
मैं गया नहीं—
मैं तुम में उतर गया हूँ।
अब मैं
तुम्हारी हथेलियों में हूँ
जब वे कुल्हाड़ी उठाती हैं,
और तुम्हारी आँखों में हूँ
जब वे
देखकर भी नहीं देखतीं।

तुम पूछते थे—
“कौन?”
और मैं कहता था—
“दोस्त।”
अब तुम पूछते हो—
“कौन ज़िम्मेदार है?”
और हर कोई
दूसरे की ओर
इशारा करता है।

मैं धूप में खड़ा था
तो तुमने छाया ली,
मैं बारिश में खड़ा था
तो तुम सूखे रहे।

आज
तुम्हारे सिर पर
सीधी धूप है,
और तुम पूछते हो—
पेड़ कहाँ गए?
मैं शहर के नक़्शे में
अतिक्रमण था,
पर तुम्हारी आत्मा में
मैं आख़िरी सीमा था।

मैंने
न लाठी उठाई,
न गोली चलाई,
फिर भी
तुम सुरक्षित थे—
क्योंकि डर
मुझसे डरता था।

अब डर
तुम्हारा चौकीदार है।
तुम कहते हो—
देश बचाना है,
शहर बचाना है,
घर बचाना है—
पर याद रखो,
जो पेड़
बिना वेतन
बिना वर्दी
बिना आदेश
तैनात था—
वह कटेगा
तो सबसे पहले
मनुष्य असुरक्षित होगा।

मैं गिरा नहीं हूँ,
मैं फैला हूँ—
तुम्हारी साँसों की कमी में,
तुम्हारी नींद की बेचैनी में,
तुम्हारे बच्चों के सवालों में।

अगर कभी
फिर से “दोस्त” कहलाना चाहो,
तो मुझे
रोपना पड़ेगा—
ज़मीन में नहीं,
अपने भीतर।

क्योंकि
जंगल कटने से
धरती उजड़ती है,
और मनुष्य कटने से
सभ्यता।

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