ब्रह्मांड
साम्यवादी व्यवस्था का
अद्भुत प्रयोग है—
जहाँ कोई केंद्र नहीं,
कोई मालिक नहीं,
कोई जमा नहीं करता
भविष्य के लिए।
ऊर्जा
जहाँ बनी
वहीं खर्च हो जाती है,
प्रकाश
जिसे मिला
उसे रोशन कर देता है,
कण
अपने से अधिक
किसी के नहीं होते।
न कोई अमीर तारा,
न कोई भूखा ग्रह,
न कोई सीमा
जहाँ आकाश कहे—
यह मेरा है।
सब कुछ
साझा गति में है,
साझा जोखिम में,
साझा विलय में।
सिर्फ मनुष्य
अपवाद है।
उसने
संचय सीखा,
स्वामित्व सीखा,
और फिर
डर सीखा।
उसने
बुद्धि पाई—
और उसे
समझ में बदलने के बजाय
हथियार बना लिया।
शायद
मनुष्य को इसलिए
अलग रखा गया
कि वह देख सके—
बुद्धि मिल जाने की
ब्रह्मांडीय चूक
किस तरह
जीवन को
अकेला,
हिंसक,
और थका हुआ
बना देती है।
जब सोच
साझा नहीं रहती,
जब चेतना
संपत्ति बन जाती है,
और जब बुद्धि
करुणा से
अलग हो जाती है।
ब्रह्मांड
अब भी
अपनी साम्यवादी लय में है—
बिना पुरस्कार,
बिना दंड।
और मनुष्य
उस प्रयोग का
एक फुटनोट है—
यह जानने के लिए
कि यदि
बुद्धि
अहंकार के हाथ लग जाए
तो
अंजाम क्या होता है।